Sunday, August 16

रीवा। देश में अंग्रेजों के खिलाफ जब वर्ष 1857 में क्रांति की अलख जगी थी उसमें विंध्य क्षेत्र में रीवा प्रमुख केन्द्र था। यहां से सैकड़ों युवाओं की टोलियों ने अंग्रेजी हुकूमत को परेशान कर रखा था। इसी में एक टोली का नेतृत्व श्यामशाह के हाथ में था। उनके प्रभाव का क्षेत्र जबलपुर से पन्ना, मानिकपुर, शंकरगढ़, प्रयागराज, मिर्जापुर, सीधी और शहडोल के हिस्से तक था। हर जगह उनके क्रांतिकारी साथी थे जो अंग्रेजों के ठिकानों को तबाह कर रहे थे। अंग्रेजों के अधिकारी भी इन क्रांतिकारियों से सीधे नहीं भिड़ते थे वह साजिश के तहत हमले कराते थे। हालांकि श्यामशाह एवं उनके साथियों ने अंग्रेजों को काफी नुकसान पहुंचाया था। जिसके चलते कम समय में ही वह अंग्रेजों के हिटलिस्ट में शामिल हो गए थे।

खम्हरिया गांव में हुआ था जन्म
श्यामशाह का जन्म सन 1823 में रीवा के नजदीक खम्हरिया गांव में हुआ था। उनके पिता शिवा सिंह कोठी वंशी बघेल थे। यह वंश अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध था, इस वंश के लोगों को मुड़कटिया बघेल भी कहा जाता था। लाल श्यामशाह सिंह की शिक्षा दीक्षा घर पर ही हुई थी, कम उम्र में ही उन्होंने संस्कृत में अच्छी जानकारी अर्जित कर ली थी। कुश्ती, घुड़सवारी, तलवारबाजी में वह शुरू से ही आगे रहे।

क्रांतिकारी को बचाने के बाद बागी घोषित किए गए
श्यामशाह के वंशज खम्हरिया घराने के अधिवक्ता जय सिंह बघेल बताते हैं कि रीवा में 1857 की क्रांति के समय ब्रिटिश सरकार के पॉलिटिकल एजेंट लेफ्टिनेंट जॉन विलियम विलोबी आसवन ने एक तेलंग ब्राह्मण को जासूसी के आरोप में गिरफ्तार कर फांसी की सजा सुना दी थी। उन्हें रीवा के 3 सरदार धीर सिंह, पंजाब सिंह एवं रणमत सिंह आदि के साथ लाल श्यामशाह के नेतृत्व में बचा लिया था। इससे नाराज होकर श्यामशाह के साथ चारों लोगों को बागी घोषित कर दिया गया था। इसके बाद से श्यामशाह ने पूरे विंध्य में अपने करीबियों के साथ मिलकर मोर्चा खोल दिया था। श्यामशाह समृद्ध खम्हरिया परिवार से थे। उन्होंने 300 सैनिकों की व्यक्तिगत वीर वाहिनी बना रखी थी, जो युद्ध कौशल से युक्त थे। बगावत के दौरान ही देश के कई बड़े क्रंतिकारियों के संपर्क में वह आए थे।

इन स्थानों पर हुए युद्ध इतिहास में दर्ज
– श्यामशाह की वीर वाहिनी सेना का पहला युद्ध महानदी के घाट पर चंदनिया के पास हुआ, अंग्रेजों की सेना को भागना पड़ा था, उनके शस्त्र भी लूट लिए थे। उस स्थान को जुझार घाट के नाम से जाना जाता है।
– दूसरा प्रमुख युद्ध तब हुआ जब अंग्रेज कटनी के बाजार में व्यापारियों को लूट रहे थे। इसी बीच श्यामशाह की टोली ने चारों ओर से घेरकर कइयों को मारा और लूट का सारा सामान लेकर व्यापारियों को वापस कर दिया और बंदूकें अपने साथ ले आए।
– क्योंटी गढ़ी में रणमत सिंह एवं श्यामशाह प्रयागराज और बंगाल से आए कुछ क्रांतिकारियों के साथ बैठक करने वाले थे, इसकी जानकारी मिलने पर अंग्रेजों ने हमला बोल दिया। रीवा महाराजा पर भी दबाव बनाकर उनकी सेना भी अंग्रेजों ने अपने साथ ले रखी थी। रीवा के सेनापति दलथम्मन सिंह कर्चुली ने इसकी सूचना श्यामशाह तक भिजवा दी थी। इस युद्ध में अंग्रेजों के कई अधिकारी मारे गए। रीवा की सेना ने क्रांतिकारियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया।


कलकत्ता और दिल्ली तक थी गूंज
श्यामशाह ने अपनी निजी सेना के साथ मिलकर अंग्रेजों के कई बड़े ठिकानों को लूट लिया था, साथ ही उनके कई अफसरों को भी मार गिराया था। जिसके चलते अंग्रेजों के ठिकाने कलकत्ता(कोलकाता) और दिल्ली तक इसकी गूंज थी। यही वजह थी कि उन पर इनाम घोषित कर दिया गया था। अंग्रेजों के हिटलिस्ट में उनका नाम जोड़ा गया था। रीवा राज्य पर भी दबाव था कि आत्मसमर्पण कराएं। मंगल पाण्डेय और तत्याटोपे से हुई मुलाकात के बाद श्यामशाह के शौर्य की चर्चा तेजी से फैली थी।
————-
अंग्रेज छू नहीं सके, अपनों ने ही धोखा दिया
जिंदा या मुर्दा पकड़वाने का इनाम श्यामशाह पर घोषित किए जाने के बाद अंग्रेजों ने लंबी साजिश रची। लगातार अंग्रेजों से मुकाबला करने के चलते करीब तीन सौ की संख्या में व्यक्तिगत सेना के खर्च का भार भी श्यामशाह पर पडऩे लगा था। उनके वंशज जय सिंह बताते हैं कि सेना के खर्च और अंग्रेजों से मुकाबले के लिए और लोगों को साथ जोडऩे के लिए धन की जरूरत थी। उस दौरान बुढ़वा के ठाकुर देवी सिंह एवं चचाई के गुरुपद सिंह को जो उधार दिया था उसे वापस लेने के लिए संदेश भिजवाया तो वह राजी हो गए और बुलावा भेजा। कर्ज से बचने और इनाम की राशि पाने के उद्देश्य से साजिश रची गई। श्यामशाह को गुप्त वार्ता के लिए जंगल के रास्ते ले जाया जा रहा था, इसी बीच उनके ही लोगों ने पीछे से गोली मार दी। जय सिंह के मुताबिक गोली लगने से श्यामशाह जख्मी होकर गिर गए थे। उनका शौर्य ऐसा था कि गोली मारने वालों की भी हिम्मत नहीं हुई की जाकर देखें। इसके लिए भमरहा के रणधीर को भेजा, उनके आने की आहट पाकर श्यामशाह शांत हो गए और पहुंचते ही बैठ गए। इस दगाबाजी के चलते वह घायल अवस्था में होने के बावजूद जासूसी करने वाले को मार सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। कहा कि अपनों का वध नहीं कर सकते, इसलिए नाक काट दिया था ताकि दूसरे दगाबाजों को भी इसका संदेश जाए। जंगल में अकेले थे और अत्यधिक खून बहने के चलते दम तोड़ दिया। इस क्रांतिकारी की स्मृति में सरकार ने रीवा के मेडिकल कालेज का नाम अमर शहीद श्यामशाह के नाम पर रखा है।

Share.
Leave A Reply