नई दिल्ली । भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में 25 जून एक ऐसे दिन के रूप में दर्ज है, जिसने देश की राजनीति और संवैधानिक व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। वर्ष 1975 में इसी दिन तत्कालीन केंद्र सरकार की सिफारिश पर देश में आपातकाल लागू किया गया था, जो मार्च 1977 तक प्रभावी रहा।
आपातकाल की बरसी पर प्रधानमंत्री Narendra Modi ने इसे भारतीय लोकतंत्र के सबसे कठिन और अंधकारमय दौरों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि उस अवधि में नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हुई और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि यह दिन उन लोगों के साहस को भी याद करने का अवसर है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक आदर्शों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। उन्होंने संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध रहने का आह्वान किया।
‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा दिन
केंद्र सरकार ने हाल के वर्षों में 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा कि यह दिन लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा के महत्व की याद दिलाता है तथा देशवासियों को संवैधानिक मूल्यों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देता है।
कैसे लागू हुआ था आपातकाल
25 जून 1975 की रात तत्कालीन राष्ट्रपति Fakhruddin Ali Ahmed ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद केंद्र सरकार को व्यापक अधिकार प्राप्त हो गए और कई संवैधानिक सुरक्षा प्रावधान प्रभावी रूप से सीमित कर दिए गए।
इस दौरान प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई, राजनीतिक गतिविधियों पर निगरानी बढ़ी और अनेक विपक्षी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। संसद ने भी कई संवैधानिक संशोधन पारित किए, जिन पर बाद में व्यापक बहस हुई।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
आपातकाल की घोषणा से कुछ सप्ताह पहले, 12 जून 1975 को Indira Gandhi को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसला आया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली लोकसभा चुनाव से संबंधित मामले में उनके निर्वाचन को निरस्त कर दिया था। इस निर्णय के बाद देश में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गईं और विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग शुरू कर दी।
उस समय विपक्षी नेता Jayaprakash Narayan के नेतृत्व में सरकार विरोधी आंदोलन भी गति पकड़ रहा था। दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित सभा में व्यापक जनसमर्थन देखने को मिला, जिसके बाद राजनीतिक तनाव और बढ़ गया।
गिरफ्तारियां और प्रतिबंध
आपातकाल लागू होने के बाद अनेक विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को हिरासत में लिया गया। मीडिया पर नियंत्रण बढ़ा और सरकार की आलोचना करने वाली सामग्री के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाए गए। इस अवधि में मीसा (MISA) सहित विभिन्न कानूनों के तहत बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया।
विवादित फैसले और आलोचनाएं
आपातकाल के दौरान चलाए गए कुछ सरकारी अभियानों, विशेष रूप से नसबंदी कार्यक्रम, को लेकर बाद में व्यापक आलोचना हुई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसी दौर में सत्ता के केंद्रीकरण और परिवारवाद को लेकर भी बहस तेज हुई थी।
1977 में हुआ अंत
मार्च 1977 में आम चुनाव कराए गए और आपातकाल समाप्त कर दिया गया। चुनाव परिणामों में तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। इसके साथ ही भारतीय लोकतंत्र ने एक नए राजनीतिक अध्याय में प्रवेश किया।
इतिहास का महत्वपूर्ण सबक
राजनीतिक मतभेदों के बावजूद अधिकांश इतिहासकार और संवैधानिक विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण परीक्षा थी। यह दौर नागरिक अधिकारों, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक संतुलन के महत्व को समझने का अवसर भी प्रदान करता है। आज, 51 वर्ष बाद भी, आपातकाल भारतीय राजनीति और लोकतंत्र पर होने वाली चर्चाओं का एक प्रमुख विषय बना हुआ है।
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मीसाबंदी की जुबानी, आपातकाल की कहानी
रीवा। मीसाबंदी सुभाष श्रीवास्तव ने आपातकाल की घटनाओं को याद करते हुए कहा कि 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला दिन था, जब देश में लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचल दिया गया। उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मीसा कानून के तहत पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया था, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त हो गई और विरोध की आवाजों को दबा दिया गया। श्रीवास्तव ने कहा कि यह निर्णय लोकतंत्र को कमजोर करने की सोची-समझी साजिश थी। उनदिनों रीवा में भी इसको लेकर विरोध तेज हो गया था।
सुभाष ने कहा कि उस दौर में देश में नो अपील, नो वकील, नो दलील जैसी स्थिति बन गई थी। मीसा के तहत हजारों लोगों को बिना सुनवाई के जेलों में डाल दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगाकर मीडिया की स्वतंत्रता भी समाप्त कर दी गई थी। आपातकाल के पीछे दो प्रमुख घटनाएं थीं, पहली, 1975 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुआ व्यापक जन आंदोलन, जिसमें लाखों लोग शामिल हुए और सरकार के खिलाफ जनाक्रोश सामने आया। दूसरी, 1971 के रायबरेली चुनाव से जुड़ा विवाद, जिसमें अदालत के फैसले के बाद राजनीतिक संकट गहरा गया। उन्होंने बताया कि आपातकाल के दौरान देशभर में विपक्षी नेताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं, जिनमें कई प्रमुख राष्ट्रीय नेता शामिल थे।
रीवा संभाग में भी इसका व्यापक असर देखने को मिला, जहां लगभग 300 लोगों ने गिरफ्तारियां दीं और 80 से अधिक लोग मीसा के तहत जेल भेजे गए। श्रीवास्तव ने बताया कि उन्हें स्वयं 18 माह 6 दिन तक जेल में रहना पड़ा। युवा अवस्था में जेल जाना उनके जीवन का सबसे कठिन समय था, लेकिन इसने लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के प्रति उनकी समझ को और मजबूत किया। रीवा में जेल में स्थान कम होने की वजह से जबलपुर एवं दूसरे जेलों में लोगों को शिफ्ट किया गया था। आपातकाल भले ही इतिहास बन चुका हो, लेकिन यह घटना लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमेशा चेतावनी के रूप में याद रखी जाएगी। उन्होंने कहा कि मीसाबंदियों के संघर्ष और बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।





