Saturday, February 7

रीवा। विंध्य क्षेत्र प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक धरोहरों से समृद्ध रहा है। विंध्य और बुंदेलखंड के विभिन्न अंचलों में शैव कालीन, राजपूत कालीन तथा कल्चुरि कालीन स्थापत्य के उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलते हैं। प्राचीन मूर्तिकला का एक अद्भुत और दुर्लभ उदाहरण गुढ़ विधानसभा क्षेत्र के समीप ग्राम खामडीह में स्थित भैरवनाथ बाबा की विशाल प्रतिमा है। यह प्रतिमा भगवान शिव के उग्र रूप काल भैरव की देश की सबसे बड़ी प्रतिमाओं में से एक मानी जाती है।अद्भुत शयन मुद्रा में निर्मित यह प्रतिमा अपनी भव्यता और सौंदर्य के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

प्रतिमा की लंबाई 8.5 मीटर तथा चौड़ाई 3.7 मीटर है। वर्षों तक यह प्रतिमा विंध्य की प्रमुख कैमोर पर्वत माला की गोद में खुले आसमान के नीचे स्थित रही। शासन की एलएडी योजना के अंतर्गत अब इसके चारों ओर दो मंजिला मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर परिसर में सामुदायिक भवन, आठ दुकानें एवं अन्य सहायक निर्माण कार्य भी कराए गए हैं। माना जाता है कि भैरवनाथ की यह विशाल प्रतिमा 10वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य कल्चुरि काल में निर्मित कराई गई थी। शयन मुद्रा में यह प्रतिमा एक ही विशाल पत्थर को तराशकर बनाई गई है। काले रंग के बलुआ पत्थर से निर्मित यह मूर्ति शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। भैरवनाथ के चेहरे पर रौद्र भाव के साथ असीम शांति का भाव स्पष्ट रूप से झलकता है।
चतुर्भुज रूप में अंकित इस प्रतिमा के दाहिने ऊपरी हाथ में सृष्टि के पालन और संहार का प्रतीक त्रिशूल है, जबकि निचले दाहिने हाथ में ध्यान और भक्ति का प्रतीक रुद्राक्ष माला सुशोभित है। ऊपरी बाएं हाथ में तीन शीषों वाला सर्प लिपटा हुआ है, जो त्रिशक्ति का प्रतीक माना जाता है। बाएं निचले हाथ में बीज और फल दर्शाए गए हैं, जो उर्वरता और सृजन शक्ति के प्रतीक हैं। भैरवनाथ के शीष पर मुकुट सुशोभित है। वे कुंडल, अनेक हार और यज्ञोपवीत से अलंकृत हैं। प्रतिमा को चार परिचारिकाएं घेरे हुए हैं, जिनमें से दो बैठी हुई और दो खड़ी मुद्रा में अंकित हैं। यह प्रतिमा हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। रोग निवारण, भय से मुक्ति और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की कामना लेकर दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
मंदिर के चारों ओर पथरीला एवं ढालू क्षेत्र है, जिसे भविष्य में पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह स्थल धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से विंध्य क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण पहचान बनकर उभर रहा है। बताया जाता है कि वर्षों पहले एक बार इस प्रतिमा को उठाने का प्रयास हुआ था लेकिन प्रतिमा उठने के बाद गिर गई और हाथ का एक हिस्सा टूट गया था। जिसके बाद से उठाने का प्रयास बंद कर दिया गया और अब उसी शयन मुद्रा के अनुसार ही मंदिर का विकास किया गया है। मंदिर दो मंजिला इसीलिए बनाया गया है कि वहां पर आने वाले लोग पूरी प्रतिमा भी देख सकें।

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